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Wednesday, September 8, 2010

आस्था








कोयले और हीरे के रासायनिक संयोजन में कोई अंतर नहीं होता, परन्तु दाब और ताप अधिक होने पर कोई कोयला, हीरे में परिवर्तित हो जाता है। ऎसे ही हैं शनिदेव और जन्मपत्रिका में उनकी स्थिति भी ऎसे ही परिणाम देने वाली होती है। कहते हैं जो तप कर निखर उठे वही सोना है, जर्रे की तो नियति ही जल कर राख हो जाना है। शनिदेव को यदि जीवनरूपी स्वर्ण की कसौटी कहा जाए तो कतई गलत नहीं होगा। शनिदेव की कठोर परीक्षा पर जो खरा उतरा, इतिहास ने ना केवल उसे, उसके कष्ट और त्याग को याद रखा अपितु उदाहरण की तरह देखा और वे आदर्श रूप में जनमानस में छा गए चाहे राजा नल हों, विक्रमादित्य हों या फिर राजा हरिश्चन्द्र।
आज कलियुग में हमारा दृष्टिकोण कुछ बदल सा गया है। लालबत्ती पर रूके ट्रैफिक में जब एक गरीब लडका फटे-पुराने कपडे से गाडी का काँच या बोनट साफ करता है और फिर एक-दो रूपये की मांग करता है तो हम नजर अंदाज कर देते हैं लेकिन जब शनिवार को वही लडका बर्तन में लोहे की प्रतिमा और तेल लेकर " जय शनि महाराज " बोलता हुआ हमारे पास आता है तो स्वचालित यंत्र रूपी हमारे हाथ उसके बर्तन में एक या दो अथवा उपलब्ध सिक्का डाल देते हैं।
एक बार शनिदेव ने भगवान शंकर से कहा कि वो उन पर आना चाहते हैं। भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पिता के घर भेज दिया, नन्दी एवं अन्य गणों को भी कुछ समय के लिए स्वयं से दूर कर दिया। जब शनिदेव ने यह देखा तो मुस्कुरा कर कहा कि जब पत्नी, वाहन, नौकर कुछ भी पास नहीं है तो मैं आकर भी क्या करूँगा ?
संभवत: शनिदेव का व्यक्ति को परखने का यह अपना ही अंदाज है कि वे सम्पन्न व्यक्तियों को अधिक पीडा या कष्ट देते हैं जो शायद इस बात की ओर संकेत करता है कि अत्यधिक ऎशो-आराम पाने के लिए व्यक्ति ने जो भी कार्य अनुचित ढंग से किए हैं, उनके दण्ड स्वरूप उस ऎशो-आराम को अपनी दशा-अन्तर्दशा में अथवा साढेसाती में वापस लेकर व्यक्ति को यह एहसास कराना चाहते हों कि वह कहाँ-कहाँ गलत था और उस गलती के परिणाम क्या-क्या रहे हांगे ?  इसके विपरीत एक मजदूर जो दिनभर कडी मेहनत करके अपने परिवार के लिए आवश्यकतानुरूप चीजें जुटाता है, उसे कभी हमने शनिदेव से पीडित या प्रताडित होते कम ही देखा है।
जन्मपत्रिका देखकर जैसे ही पण्डित जी कहते हैं कि शनिदेव की साढेसाती लग चुकी है तो भय और आशंका के काले बादल व्यक्ति को घेर लेते हैं और उससे बचने के लिए पण्डित जी फिर जो कुछ भी कहते हैं वह सब कुछ चाहे-अनचाहे हमें मानना ही होता है और हम प्रत्येक उस बात को स्वीकार करते हैं जो हमें बताई जाती हैं। स्वयं पर साढेसाती या पनौती की कल्पना मात्र से ही व्यक्ति सिहर उठता है।
इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि संतुलन के प्रतीक, दण्डनायक शनिदेव को हम समझे ही नहीं, उनके दण्ड के स्वरूप से इतने भयभीत हो गए कि उनके द्वारा किए जाने वाले न्याय को हम देख ही नहीं सके या हम उस न्याय से अनभिज्ञ हैं।
शनिदेव क्रांति लाने की क्षमता देते हैं। सूर्य से दूर होने के कारण सूर्य की रोशनी से वंचित शनि काले हैं कठोर है परन्तु यही कठोरता अनुशासन भी है। धर्म भाव में बैठे शनि अपने (धर्म) क्षेत्र में गहराई और अनुशासन देते हैं जो उच्चा कोटि के तपस्वी का प्रथम गुण और आवश्यकता है। इन शनिदेव को जब बृहस्पति की शुभ दृष्टि प्राप्त हो जाती है तो धर्म, आघ्यात्म और वैराग्य का अद्भुत संगम होता है। कुछ तपस्वियों की कुण्डली में इसका विश्लेषण करते हैं।
न कोई हार अंतिम हार होती है न कोई अंतिम जीत। किसी भी हार या जीत को अंतिम मान लेने से दोनों ही स्थितियों में अकर्मण्यता आ जाती है। शनिदेव, जो कठोर श्रम के प्रतीक हैं, को अकर्मण्यता बिल्कुल पसंद नहीं है। सुख-दु:ख के भँवर ही व्यक्ति को श्रम करने के लिए प्रेरित करते हैं। दण्डनायक शनि ही समय-समय पर कर्मो के लेखे-जोखों के अनुसार दण्ड देते रहते हैं जिससे सन्तुलन बना रहे। ये तो हम अज्ञानी हैं, जो शनिदेव की संतुलन की इस प्रक्रिया के वास्तविक अर्थ को समझ नहीं पाते और थोडे से ही कष्ट में चीत्कार उठते हैं।
अंग्रेजी के महान कवि एवं लेखक विलियम शेक्सपियर ने लिखा था- Adversity is the best teacher. शनिदेव वही शिक्षक हैं जो कष्ट की कसौटी पर व्यक्ति को परखते हैं, मजबूत बनाते हैं और उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करने में अहम भूमिका निभाते हैं, अत: शनिदेव और उनका न्याय न केवल हमारे कर्मो का उचित लेखा जोखा है अपितु जीवन की पाठशाला का एक महत्वपूर्ण अघ्याय भी है। शनिदेव के सच्चो स्वरूप को समझने के कारण निम्न पंक्तियाँ बन पडी है-
क्षमा प्रार्थी हूं मैं,
हे परम पिता परमेश्वर तेरे फैसलों पर एतराज जताया
जब मुस्कुराहटें दी तूने, तो मैं खिलखिलाया
पर चार आँसू भी आँखों में न झेल पाया
सुख देख चहु ओर, हर्षित मन लहलहाया
आहट ही सुन दु:ख की, अंतर्मन घबराया कभी कोसा किस्मत को और
कभी तुझे विधाता मैं, मूढ काश ये समझ पाता रात दिन का,
पतझड बसंत का संतुलन है बनाता | 









  

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